IPO क्या होता है ?

IPO का मतलब है, अगर कोई प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी पब्लिक (आम जनता) को अपने कम्पनी में हिस्सेदार बनाना चाहती है तो उसे शेअर मार्केट के जरिये अपनी हिस्सेदारी (शेअर्स) बेचनी होगी और ऐसा करने के लिए उस कम्पनी को पहले शेअर मार्केट में अपने शेअर्स की लिस्टिंग करनी होगी और ये लिस्टिंग करने की शुरुवात होती है – IPO से | यानी आय पि ओ का मतलब है , किसी कम्पनी द्वारा पहली बार पब्लिक को शेअर्स बेचना या हिस्सेदार बनाना की शुरुवात करना |

आप किसी बढ़िया मुनाफ़ा कमाने वाले कम्पनी को जानते है और वो इन दिनों IPO लेकर शेअर मार्केट में आ रही है तो कम से कम 15 हजार रूपये तैयार रखिये ताकि उस कम्पनी में निवेश कर सकें |

कम्पनी स्टॉक मार्केट में क्यों आती है ?

उदाहरण से हर हिस्से को समझने की कोशिश करते है | एक कम्पनी है “व्हाईट प्राइवेट लिमिटेड” इस कम्पनी की शुरुआत “चार” लोगों ने मिलकर कुछ रकम जुटाकर की थी जिन्हें हम “प्रमोटर या फाउडंर” कहते है | अब इस कंपनी का बिजनेस बढने लगा और बिजनेस बढाने के लिए एक ऐसे अच्छे खासे रकम की जरूरत है “जिसपर ब्याज ना देना पड़े” |

तो सबसे पहले कम्पनी को प्राइवेट लिमिटेड से बदलकर लिमिटेड बनाना पड़ेगा | यानी ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ने पर कम्पनी में कुछ बदलाव करने होते है | जैसे की कम्पनी में हिस्सेदार जोड़ने के लिए शेअर्स बनाना | तो ज्यादा पैसा तो पब्लिक से ही आ सकता है इसलिए कम्पनी स्टॉक मार्केट में शेअर्स IPO के जरिये लेकर आती है | स्टॉक मार्केट में आने से दुनिया का कोई भी व्यक्ति या अन्य कम्पनियाँ शेअर्स खरीद सकते है |

कम्पनी शेअर्स कैसे बनाती है ?

अब “व्हाईट प्राइवेट लिमिटेड” से कम्पनी का नाम “व्हाईट लिमिटेड” हो जाएगा और कम्पनी का मुल्यांकन (वॅल्यूशन) किया जाएगा | मान कर चलते है की कम्पनी की वॅल्यू (इंटरप्राइज वॅल्यू) 100रूपये है | और कम्पनी को एक हजार रूपये की जरूरत है | अब कम्पनी अपने हिस्से या हिस्सेदारी को कैसे बेचेगी ? कम्पनी का वॅल्यूएशन 100 रुपये हुआ है तो कम्पनी 1 रूपये का 1 शेअर बनाती है | कम्पनी की वॅल्यू में से 1 रुपये वॅल्यू पर मालिकाना हक़ उस व्यक्ति का होगा, जो भी इस “1 रूपये” के हिस्से को खरीदेगा | तो अगर आप इस 1 रूपये वॅल्यू के शेअर को खरीदते है तो आप इस कम्पनी के एक हिस्से के मालिक (हिस्सेदार, शेअरहोल्डर) बन जायेंगे |

पर कपनी को 1 रूपये का हिस्सा 1 रूपये में बेचकर किसी तरह का फायदा नहीं होगा | इसलिए कम्पनी अपना एक शेअर (जिसकी वॅल्यू 1 रूपये है) उसे 10 रूपये में बेचना चाहती है | ताकि 10 रूपये के हिसाब से जितने भी शेअर्स पब्लिक खरीदेगी प्रति शेअर 9 रूपये का निवेश कम्पनी में आएगा | कम्पनी का प्रमुख उद्धेश्य निवेशकों से निवेश लेना ही तो है | यानी हर कम्पनी अपने शेअर के असली मूल्य से कहीं ज्यादा शेअर की कीमत रखती है ताकि जो भी व्यक्ति इस शेअर को ख़रीदे उससे कम्पनी में निवेश आये |

हर कम्पनी चाहती है की शेअर की कीमत बढ़ती रहे और उसी तरह कम्पनी में निवेश भी बढ़े | शेअर की असली कीमत (1 रूपये) को फेस वॅल्यू कहते है, शेअर जिस कीमत (10 रूपये) पर बेचा जा रहा है उसे शेअर प्राइज कहते है और फेस वॅल्यू और शेअर प्राइज के बीच का जो अंतर है (9 रूपये) उसे शेअर प्रीमियम कहते है |

IPO Summary

एक कम्पनी है जिसकी वॅल्यू 100 रूपये है जिससे वो 100 शेअर्स बनाती है जिसका मतलब है, 1 रूपये का 1 शेअर (इस एक रूपये को “फेस वॅल्यू” कहते है) | अब यह शेअर निवेशक 10 रूपये में खरीदेंगे यहाँ 10 रूपये शेअर की कीमत है | तो जो भी व्यक्ति 10 रूपये का यह शेअर खरीदेगा उनका 9 रुपया इस कम्पनी में निवेश होगा, जिसे शेअर प्रीमियम कहते है | शेअरहोल्डर को शेअर की कीमत बढ़ेगी तो शेअर के कीमत की बढ़त से मुनाफा होगा ही और अगर एक साल के बाद कम्पनी बिजनेस से जो भी मुनाफा कमाएगी उसमें से हर निवेशक को कुछ मुनाफा देगी जिसे “डिविडेंड” कहाँ जाता है | यानी शेअर खरीदने के दो फायदे होते है, कीमत बढ़ना और डिविडेंड पाना |

 



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